वर दे, वीणावादिनि वर दे ।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे ।
वीणावादिनि वर दे ॥

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे ।
वर दे, वीणावादिनि वर दे ॥

नव गति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ, नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे ।
वर दे, वीणावादिनि वर दे ॥

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे ।
वीणावादिनि वर दे ॥
– सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

Leave a Reply